पुरोला में कांग्रेस की सबसे मजबूत दावेदारी क्यों बनकर उभरे हैं हरिमोहन जुवांठा?

उत्तरकाशी जनपद की अनुसूचित जाति आरक्षित पुरोला विधानसभा सीट पर कांग्रेस के भीतर टिकट को लेकर चर्चाएं तेज हैं। पार्टी के कई नेता अपनी-अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं, लेकिन यदि संगठनात्मक स्वीकार्यता, राजनीतिक विरासत, जनसंपर्क, स्वच्छ छवि और जीत की संभावनाओं को एक साथ रखकर मूल्यांकन किया जाए तो हरिमोहन जुवांठा का नाम सबसे मजबूत दावेदारों में नहीं, बल्कि सबसे आगे दिखाई देता है।
उत्तराखण्ड बनने के बाद पुरोला विधानसभा की राजनीति पर यदि पिछले दो दशकों का दृष्टिपात किया जाए तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि जुवांठा परिवार इस क्षेत्र की राजनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की प्रत्याशी शांति देवी जुवांठा ने 10 हजार से अधिक मत प्राप्त कर मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी। इसके बाद वर्ष 2007 में राजेश जुवांठा ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया और लगभग 15,500 मत प्राप्त किए। यह जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं थी, बल्कि उस राजनीतिक विश्वास की अभिव्यक्ति थी जो जनता ने जुवांठा परिवार के प्रति दिखाया।
वर्ष 2012 में भी कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में राजेश जुवांठा ने 10,804 मत प्राप्त किए। यद्यपि उस चुनाव में जीत नहीं मिली, लेकिन यह स्पष्ट हुआ कि पुरोला में जुवांठा परिवार का एक स्थायी जनाधार मौजूद है। चुनावी आंकड़े बताते हैं कि 2002, 2007 और 2012 के बीच जुवांठा परिवार से जुड़े कांग्रेस प्रत्याशियों को कुल मिलाकर लगभग 36 हजार से अधिक मत प्राप्त हुए, जो इस परिवार की राजनीतिक स्वीकार्यता का प्रमाण माना जा सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरिमोहन जुवांठा की सबसे बड़ी ताकत उनकी व्यक्तिगत छवि है। वर्तमान समय में जब राजनीति में जनविश्वास सबसे बड़ी पूंजी बन चुका है, तब हरिमोहन जुवांठा एक साफ-सुथरी और विवादों से दूर छवि वाले नेता के रूप में देखे जाते हैं। वे लंबे समय से क्षेत्र के सामाजिक कार्यक्रमों, जनसमस्याओं और स्थानीय मुद्दों से जुड़े रहे हैं। यही कारण है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच भी उनका नाम सहज स्वीकार्यता के साथ लिया जाता है।
हरिमोहन जुवांठा की दावेदारी को मजबूत बनाने वाला दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष उनके पास स्वर्गीय बर्फियालाल जुवांठा की राजनीतिक विरासत है। बर्फियालाल जुवांठा को पुरोला क्षेत्र में एक ईमानदार, सरल और जनहितैषी नेता के रूप में याद किया जाता है। राजनीतिक विरोधी भी उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी और जनसेवा के प्रति समर्पण पर प्रश्न नहीं उठाते थे। आज भी गांवों और दूरस्थ क्षेत्रों में उनके कार्यों और व्यवहार की चर्चा सम्मान के साथ की जाती है। ऐसे में हरिमोहन जुवांठा को केवल एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि उस राजनीतिक परंपरा के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है जिसने जनता के बीच विश्वास अर्जित किया था।
कांग्रेस के भीतर टिकट की दौड़ में कई दावेदार सक्रिय हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश की पहचान सीमित क्षेत्रों या विशेष समूहों तक ही दिखाई देती है। इसके विपरीत हरिमोहन जुवांठा के पक्ष में परिवार की राजनीतिक विरासत, संगठन के साथ निरंतर जुड़ाव, कार्यकर्ताओं में स्वीकार्यता तथा विभिन्न सामाजिक वर्गों में संवाद की क्षमता जैसे अनेक कारक एक साथ दिखाई देते हैं। यही कारण है कि पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा तेजी से बन रही है कि यदि कांग्रेस को पुरोला में मजबूत और एकजुट लड़ाई लड़नी है तो ऐसा चेहरा सामने लाना होगा जिस पर संगठन और जनता दोनों भरोसा कर सकें।
राजनीतिक समीकरणों की दृष्टि से भी यह चुनाव केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि विश्वास और विश्वसनीयता का चुनाव माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्र में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में रहे हैं। जनता अब ऐसे प्रतिनिधि की तलाश में है जो केवल चुनावी समय में नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल में क्षेत्र के साथ खड़ा दिखाई दे। हरिमोहन जुवांठा समर्थकों का दावा है कि उनके पास यही राजनीतिक पूंजी मौजूद है।
पुरोला विधानसभा के चुनावी इतिहास को देखें तो यह सीट हमेशा से व्यक्तित्व आधारित राजनीति को महत्व देती रही है। यहां जनता केवल पार्टी नहीं, बल्कि प्रत्याशी की स्वीकार्यता को भी गंभीरता से देखती है। ऐसे में कांग्रेस यदि जीत की संभावनाओं को प्राथमिकता देती है तो हरिमोहन जुवांठा का नाम स्वाभाविक रूप से सबसे मजबूत दावेदारों में उभरता है।
आने वाले समय में अंतिम निर्णय कांग्रेस नेतृत्व को लेना है, लेकिन वर्तमान राजनीतिक माहौल, कार्यकर्ताओं की राय और क्षेत्र में बन रहे जनमत को देखकर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि पुरोला विधानसभा में कांग्रेस की टिकट की दौड़ में हरिमोहन जुवांठा की दावेदारी सबसे प्रभावशाली और वजनदार दावेदारियों में से एक बन चुकी है। यदि पार्टी संगठनात्मक एकता और चुनावी जीत दोनों को लक्ष्य मानकर निर्णय लेती है, तो हरिमोहन जुवांठा का नाम उस निर्णय के केंद्र में दिखाई देता है।
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