उत्तराखंड हाईकोर्ट का अहम फैसला, 13 साल बाद मिली रिहाई
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत एक महत्वपूर्ण और मिसाल कायम करने वाला फैसला सुनाया है। वर्ष 2003 में हत्या और लूट के प्रयास के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे एक कैदी को अदालत ने नाबालिग घोषित करते हुए तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने माना कि अपराध के समय आरोपित की उम्र 18 वर्ष से कम थी, ऐसे में उसे दी गई उम्रकैद की सजा कानूनन वैध नहीं है।
यह फैसला न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत नाबालिग होने का दावा किसी भी स्तर पर, यहां तक कि सजा की पुष्टि या लंबे समय तक जेल में रहने के बाद भी उठाया जा सकता है।
2003 के मामले में हुई थी दोषसिद्धि
मामला वर्ष 2003 का है, जब रुड़की क्षेत्र में एक हत्या और लूट के प्रयास की घटना सामने आई थी। इस मामले में सत्र न्यायालय ने आरोपित को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। वर्ष 2013 में उत्तराखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस सजा को बरकरार रखा, जबकि बाद में उच्चतम न्यायालय ने भी दोषसिद्धि की पुष्टि कर दी थी।
2021 में उठाया गया नाबालिग होने का दावा
हत्या के दोषी ने वर्ष 2021 में जेल से एक प्रार्थनापत्र भेजकर यह दावा किया कि घटना की तिथि 24 जून 2003 को वह नाबालिग था। इस दावे की सत्यता जांचने के लिए हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल को विस्तृत जांच के निर्देश दिए।
जांच में सामने आई वास्तविक उम्र
रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल द्वारा स्कूल रिकॉर्ड, स्कॉलर रजिस्टर और संबंधित गवाहों के बयानों की गहन जांच की गई। जांच रिपोर्ट में यह सामने आया कि आरोपित की वास्तविक जन्म तिथि 22 मई 1988 है। इस आधार पर यह पाया गया कि वारदात के समय उसकी उम्र लगभग 15 वर्ष 1 माह थी, यानी वह स्पष्ट रूप से नाबालिग था।
दोषसिद्धि बरकरार, लेकिन सजा अवैध
हाईकोर्ट ने जांच रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए माना कि आरोपी घटना के समय नाबालिग था। अदालत ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के अनुसार किसी नाबालिग को न तो उम्रकैद जैसी सजा दी जा सकती है और न ही उसे तीन वर्ष से अधिक समय तक सुधार गृह में रखा जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी माना कि घटना में आरोपित की भूमिका अन्य सह-आरोपियों के समान थी, इसलिए उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया। हालांकि, सजा के प्रश्न पर अदालत ने स्पष्ट किया कि वह पहले ही 13 साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है, जो कानूनन अनुमन्य अवधि से कहीं अधिक है।
तत्काल रिहाई का आदेश
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी की तत्काल रिहाई का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि इतने लंबे समय तक जेल में रखा जाना जुवेनाइल जस्टिस कानून की भावना और प्रावधानों के विपरीत है।
इस फैसले को जुवेनाइल जस्टिस कानून के तहत एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है, जो यह स्पष्ट करता है कि नाबालिग के अधिकारों की रक्षा किसी भी स्तर पर की जा सकती है, भले ही सजा की पुष्टि हो चुकी हो।



