देवभूमि उत्तराखंड को भगवान शिव की तपोभूमि कहा जाता है। यहां की धरती, पर्वत, नदियां और वन—हर कण में शिव का वास माना जाता है। इसी आस्था का जीवंत प्रतीक है लाखामंडल, जिसे श्रद्धालु ‘लाखों शिवलिंगों का गांव’ भी कहते हैं। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर यह स्थल देश-विदेश से आने वाले शिवभक्तों के लिए विशेष आकर्षण बन जाता है।
विकासनगर क्षेत्र में यमुना नदी के तट पर स्थित प्राचीन शिव नगरी लाखामंडल ऐतिहासिक, धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। मान्यताओं के अनुसार, भारत में एक ऐसा प्राचीन शिवलिंग यहीं स्थित है, जिसकी आयु करोड़ों वर्षों की बताई जाती है और जिसमें ‘सम्पूर्ण सृष्टि’ के दर्शन होने की आस्था प्रचलित है। यही कारण है कि दुनियाभर के श्रद्धालु लाखामंडल को अपनी आस्था का संगम मानते हैं।
लाखामंडल की पहचान आठवीं शताब्दी में निर्मित प्राचीन लाखेश्वर मंदिर परिसर से जुड़ी है। मंदिर परिसर में छोटे-बड़े मिलाकर लगभग सवा लाख शिवलिंग स्थापित हैं। ‘लाख’ का अर्थ लाख और ‘मंडल’ का अर्थ लिंग—इसी आधार पर इस पवित्र स्थल का नाम लाखामंडल पड़ा। प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा यह गांव आध्यात्मिक शांति और प्राचीन विरासत का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
पौराणिक ग्रंथ स्कंद पुराण के केदारखंड में वर्णन मिलता है कि महाभारत काल में पांडवों ने यहां लाखों शिवलिंगों की स्थापना की थी। मंदिर की वास्तुकला भी केदारनाथ मंदिर से मिलती-जुलती मानी जाती है, जो इसकी प्राचीनता और भव्यता को रेखांकित करती है। गर्भगृह में भगवान शिव परिवार सहित विराजमान हैं, जहां श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं।
मंदिर परिसर में माता पार्वती, भगवान गणेश, कार्तिकेय, दुर्गा, विष्णु, भैरव, सरस्वती, सूर्य और हनुमान की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। यहां पाए जाने वाले पदचिह्नों को माता पार्वती के चरणचिह्न माना जाता है, जिनके दर्शन मात्र से भक्तों को विशेष पुण्य की प्राप्ति होने की मान्यता है।
महाशिवरात्रि के अवसर पर लाखामंडल में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। भक्ति, इतिहास और प्रकृति—तीनों का संगम इस प्राचीन शिवधाम को उत्तराखंड के सबसे विशिष्ट तीर्थ स्थलों में स्थान दिलाता है।



