Korean Game Addiction: कोरियन संस्कृति का आकर्षण बन रहा मानसिक संकट, भारतीय बच्चों पर बढ़ता असर, अभिभावक चिंतित

नई दिल्ली/देहरादून।
कोरियन संस्कृति की चमक-दमक भारतीय समाज में तेज़ी से अपनी जगह बना रही है, लेकिन इसके साथ ही इसके दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे हैं। हालिया गाजियाबाद की एक दर्दनाक घटना ने इस मुद्दे को गंभीर बना दिया है, जहां कोरियन-थीम आधारित गेम की दीवानगी से जुड़ा मामला सामने आया। इस घटना ने देशभर के अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है और बच्चों की मानसिक सेहत पर बढ़ते खतरे की ओर ध्यान खींचा है।

राजकीय दून मेडिकल कॉलेज चिकित्सालय की वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. जया नवानी के अनुसार, भारत में कोरियन संस्कृति—खासतौर पर कोरियन सीरियल, म्यूजिक बैंड और ऑनलाइन गेम्स—का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि देहरादून में ही पिछले कुछ समय में करीब पांच ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें किशोर और युवा मानसिक विकृति के लक्षणों के साथ ओपीडी तक पहुंचे।

डॉ. नवानी का कहना है कि कुछ मामलों में किशोरियां कोरियन संस्कृति से इतनी प्रभावित हो चुकी हैं कि वे अपने अभिभावकों से भारत छोड़ने तक की जिद कर रही हैं। उन्होंने दो मामलों का उल्लेख करते हुए बताया कि एक किशोरी कोरियन बॉय बैंड बीटीएस (बैंगटन सोनयेओंदन) से जुड़ी गतिविधियों के लिए कोरिया जाने पर अड़ी थी, जबकि दूसरी युवती ने कोरियन धारावाहिक देखने के बाद भारतीय मूल के लड़कों के प्रति नफरत महसूस करने और कोरियन मूल के युवक से ही विवाह करने की इच्छा जताई। इन दोनों मामलों में अभिभावक मानसिक परामर्श के लिए अस्पताल पहुंचे थे।

इसी बीच, गाजियाबाद में कोरियन-लवर गेम की प्रशंसक तीन बहनों द्वारा एक साथ आत्मघाती कदम उठाने की घटना ने स्थिति की गंभीरता को और उजागर कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि किशोरों में मोबाइल फोन और स्क्रीन टाइम का अत्यधिक बढ़ना इसकी बड़ी वजह है। लगातार कोरियन कंटेंट देखने से मस्तिष्क में डोपामाइन का स्तर बढ़ता है, जो धीरे-धीरे लत का रूप ले लेता है।

ब्रेन का ‘ब्रेक सिस्टम’ हो रहा फेल

एम्स ऋषिकेश के मनोरोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. रवि गुप्ता के अनुसार, कम नींद और अत्यधिक स्क्रीन टाइम मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को प्रभावित कर रहा है। यह हिस्सा निर्णय लेने और गलत कदमों से रोकने में अहम भूमिका निभाता है। जब यह ‘ब्रेक सिस्टम’ कमजोर पड़ता है, तो व्यक्ति खुद को जोखिम भरे फैसलों से रोक नहीं पाता।
डॉ. गुप्ता ने बताया कि एम्स की ओपीडी में हर सप्ताह चार से पांच ऐसे मरीज पहुंच रहे हैं, जिन्हें इंपल्सिव डिसऑर्डर के रूप में पहचाना जा रहा है। ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल कंटेंट की लत इसके प्रमुख कारणों में शामिल है।

अभिभावकों के लिए चेतावनी: इन संकेतों पर रखें नज़र

  • बच्चे टास्क-आधारित या अत्यधिक समय लेने वाले गेम तो नहीं खेल रहे

  • सोशल मीडिया या गेमिंग प्रोफाइल में विदेशी भाषा के नामों का अत्यधिक उपयोग

  • दोस्तों, परिवार या भाई-बहनों से दूरी बनाना

  • विदेशी संस्कृति और भाषा के प्रति असामान्य लगाव

  • पहनावे, खान-पान और व्यवहार में अचानक बदलाव

विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते संवाद, स्क्रीन टाइम की सीमा और जरूरत पड़ने पर मानसिक परामर्श ही बच्चों को इस बढ़ते खतरे से बचा सकता है।

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