देहरादून/नई दिल्ली।
अत्यंत संकटग्रस्त प्रजाति घड़ियाल के संरक्षण को लेकर एक अहम रिपोर्ट सामने आई है। गंगा बेसिन में किए गए व्यापक सर्वेक्षण में कुल 3037 घड़ियाल पाए गए हैं। यह सर्वेक्षण गंगा बेसिन की 22 नदियों में किया गया, जिसमें 13 नदियों में घड़ियालों की उपस्थिति दर्ज की गई। सबसे अधिक घड़ियाल चंबल नदी में पाए गए हैं। उत्तराखंड में घड़ियालों की मौजूदगी केवल रामगंगा नदी (कॉर्बेट टाइगर रिजर्व क्षेत्र) में दर्ज की गई, जहां कुल 48 घड़ियाल रिपोर्ट हुए हैं।
यह जानकारी गंगा बेसिन में अत्यंत संकटग्रस्त घड़ियाल की जनसंख्या स्थिति एवं संरक्षण कार्ययोजना को लेकर जारी रिपोर्ट में सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, घड़ियाल के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरों के बीच यह सर्वेक्षण संरक्षण प्रयासों के लिए एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।
7680 किलोमीटर क्षेत्र में हुआ सर्वे
घड़ियालों की संख्या और उनकी स्थिति का आकलन करने के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा नवंबर 2020 से मार्च 2023 के बीच व्यापक सर्वेक्षण किया गया। इस दौरान गंगा बेसिन की 22 नदियों में करीब 7680 किलोमीटर नदी क्षेत्र को कवर किया गया। सर्वे के नतीजों में 13 नदियों में कुल 3037 घड़ियाल (हेड काउंट) पाए गए।
चंबल नदी में सर्वाधिक घड़ियाल
रिपोर्ट के मुताबिक,
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चंबल नदी में सबसे अधिक 2097 घड़ियाल,
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घाघरा नदी में 463,
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गिरवा नदी में 158 घड़ियाल दर्ज किए गए।
उत्तराखंड की बात करें तो राज्य में केवल रामगंगा नदी में ही घड़ियालों की उपस्थिति मिली है, जिसकी संख्या 48 बताई गई है।
खास परिस्थितियों में ही रह पाते हैं घड़ियाल
सर्वे और अध्ययन से जुड़े बायोलॉजिस्ट आशीष पांडा के अनुसार, घड़ियाल एक अत्यंत संवेदनशील प्रजाति है, जो केवल विशेष परिस्थितियों में ही जीवित रह पाती है। इसके लिए उपयुक्त तापमान, स्वच्छ पानी और शांत वातावरण आवश्यक होता है। घड़ियाल सीमित आहार लेते हैं और किसी भी तरह की मानवीय दखल या शोरगुल को पसंद नहीं करते।
उन्होंने बताया कि घड़ियालों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में रेत खनन, नदियों में छोड़े गए मछली पकड़ने के जाल, और तेजी से बढ़ता जल प्रदूषण शामिल हैं। कई मामलों में मछुआरों द्वारा खराब हो चुके जाल नदियों में फेंक दिए जाते हैं, जिनमें फंसकर घड़ियालों की मौत हो जाती है।
संरक्षण के लिए टास्कफोर्स गठन की सिफारिश
रिपोर्ट में घड़ियाल संरक्षण को मजबूत करने के लिए कई अहम सिफारिशें की गई हैं। इनमें घड़ियाल संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं के समन्वय के लिए एक विशेष टास्कफोर्स के गठन की बात कही गई है। इसके साथ ही नदियों में जाल न फेंकने को लेकर जागरूकता अभियान चलाने और आधुनिक तकनीक के माध्यम से घड़ियालों की निगरानी व अध्ययन करने पर जोर दिया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नदियों में प्रदूषण का स्तर कम किया जाए और पर्यावरणीय परिस्थितियां अनुकूल बनें, तो भविष्य में सोन, कोसी और गंडक जैसी नदियों में भी घड़ियालों की संख्या बढ़ सकती है।
इस अध्ययन में भारतीय वन्यजीव संस्थान की संकाय अध्यक्ष डॉ. रुचि बडोला, डॉ. शिवानी बर्थवाल, डॉ. एस.ए. हुसैन सहित कई विशेषज्ञ शामिल रहे।



