देहरादून।
अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर एक बार फिर प्रदेश की सियासत और सामाजिक संगठनों में हलचल तेज हो गई है। मामले में कथित वीआईपी के नाम का खुलासा करने और पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच की मांग को लेकर विभिन्न सामाजिक और जन संगठनों ने आंदोलन की व्यापक रणनीति तैयार की है। इसके तहत 10 जनवरी को राजधानी देहरादून में मशाल जुलूस निकाला जाएगा, जबकि 11 जनवरी को उत्तराखंड बंद का आह्वान किया गया है।
‘अंकिता न्याय यात्रा’ के बैनर तले आंदोलन
अंकिता न्याय यात्रा के बैनर तले आयोजित इस आंदोलन में महिला मंच, मूल निवास भू-कानून संघर्ष समिति समेत कई संगठनों ने एकजुट होकर भागीदारी की है। गुरुवार को देहरादून स्थित प्रेस क्लब में आयोजित पत्रकार वार्ता में आंदोलन की रूपरेखा साझा की गई।
महिला मंच की अध्यक्ष कमला पंत ने कहा कि जब तक अंकिता भंडारी हत्याकांड में शामिल कथित वीआईपी का नाम सार्वजनिक नहीं किया जाता, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा। उन्होंने दावा किया कि कोर्ट के आदेश में भी वीआईपी का उल्लेख किया गया है और अंकिता व उसके मित्र के बीच हुई बातचीत में भी इस संबंध में संदर्भ सामने आया है।
सरकार पर प्रभावशाली लोगों को बचाने का आरोप
कमला पंत ने आरोप लगाया कि मामले में रोज नए खुलासे हो रहे हैं, लेकिन सरकार प्रभावशाली लोगों को बचाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने मांग की कि सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में सीबीआई जांच कराई जाए, ताकि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित हो सके।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि वनंतरा रिजॉर्ट में साक्ष्य मिटाने की कोशिश किसने और किनके निर्देश पर की, इसका अब तक खुलासा क्यों नहीं किया गया। आंदोलनकारियों के अनुसार, जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक सरकार की नीयत पर संदेह बना रहेगा।
मुख्यमंत्री के बयान पर भी उठे सवाल
मूल निवास भू-कानून संघर्ष समिति के संयोजक मोहित डिमरी ने मुख्यमंत्री पर मामले को भटकाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री का यह बयान कि “अगर माता-पिता चाहेंगे तो सीबीआई जांच कराई जाएगी,” केवल टालने वाला बयान है। अंकिता के माता-पिता को देहरादून बुलाकर की गई मुलाकात को भी उन्होंने एक “इवेंट” करार दिया।
सरकारी घोषणाओं पर अमल नहीं होने का आरोप
वक्ताओं ने यह भी कहा कि सरकार ने अंकिता के भाई को नौकरी देने और अंकिता के नाम पर नर्सिंग कॉलेज खोलने की घोषणा की थी, लेकिन अब तक इन वादों को जमीन पर नहीं उतारा गया है। इससे जनता में आक्रोश और बढ़ा है।
जन आंदोलन बताया गया संघर्ष
आंदोलन से जुड़े नेताओं ने स्पष्ट किया कि यह लड़ाई किसी एक दल या संगठन की नहीं, बल्कि आम जनता की साझा लड़ाई है। उन्होंने आम लोगों, व्यापारियों, सामाजिक संगठनों और युवाओं से 11 जनवरी को उत्तराखंड बंद को सफल बनाने की अपील की।
प्रेस वार्ता के दौरान विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी और सदस्य बड़ी संख्या में मौजूद रहे और उन्होंने सरकार से जल्द कार्रवाई की मांग दोहराई।



