नमामि गंगे योजना पर ऑडिट रिपोर्ट ने उठाए सवाल
गंगा की स्वच्छता के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने नमामि गंगे योजना के तहत करोड़ों रुपये खर्च किए, लेकिन हाल ही में सामने आई ऑडिट रिपोर्ट ने इस योजना के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड के गंगा तटवर्ती कई शहरों में करोड़ों रुपये की लागत से बनाए गए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) आज तक घरों के सीवर कनेक्शन से नहीं जोड़े गए हैं।
परिणामस्वरूप इन एसटीपी का उपयोग सीमित रह गया है और गंगा को प्रदूषण से बचाने के उद्देश्य को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है।
ज्योतिर्मठ में 42 करोड़ खर्च, फिर भी घरों से नहीं जुड़े कनेक्शन
ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार भू-धंसाव की समस्या से जूझ रहे ज्योतिर्मठ में 3.78 एमएलडी क्षमता के दो एसटीपी बनाए गए, जिन पर सरकार अब तक करीब 42 करोड़ 78 लाख रुपये खर्च कर चुकी है।
लेकिन स्थिति यह है कि यहां अब तक किसी भी घर को इन एसटीपी से नहीं जोड़ा गया। फिलहाल केवल पांच नालों से आने वाले धूसर पानी का ही शोधन किया जा रहा है।
रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि जमीन के भीतर पानी का रिसाव भी भू-धंसाव के कारणों में से एक माना जा रहा है, जिससे स्थिति और चिंताजनक बनती है।
नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग और रुद्रप्रयाग में भी यही हाल
ऑडिट रिपोर्ट में कई अन्य नगरों की स्थिति भी इसी तरह की पाई गई है।
- नंदप्रयाग में 6.51 करोड़ रुपये की लागत से दो एसटीपी बनाए गए, लेकिन केवल तीन नालों को ही उनसे जोड़ा गया है। किसी भी घर को सीवर कनेक्शन नहीं मिला।
- कर्णप्रयाग में करीब 12 करोड़ रुपये खर्च कर पांच एसटीपी बनाए गए। यहां सात नालों को इनसे जोड़ा गया, लेकिन घरेलू सीवर लाइनें अब तक नहीं जोड़ी गईं।
- रुद्रप्रयाग में लगभग 13 करोड़ रुपये की लागत से छह एसटीपी बनाए गए, जिनमें केवल आठ नालों का धूसर पानी जा रहा है। यहां भी किसी घर का कनेक्शन नहीं है।
इसी तरह कीर्तिनगर में चार करोड़ रुपये की लागत से दो एसटीपी बनाए गए, लेकिन घरेलू सीवर कनेक्शन नहीं दिए गए।
चमोली और श्रीनगर में भी एसटीपी का सीमित उपयोग
चमोली में पुराने सस्पेंशन ब्रिज के पास करीब 64 करोड़ रुपये की लागत से एसटीपी बनाया गया, लेकिन उसे केवल एक नाले से ही जोड़ा गया है।
इसके अलावा श्रीनगर और श्रीकोट में बनाए गए तीन एसटीपी भी किसी घर के सीवर नेटवर्क से नहीं जुड़े पाए गए। इससे गंगा में जाने वाले सीवर और अपशिष्ट को रोकने का उद्देश्य अधूरा रह गया है।
बिना मांग के बना दिए 11 श्मशान घाट
ऑडिट रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि नमामि गंगे योजना के तहत जनता की मांग के बिना ही 11 श्मशान घाटों का निर्माण कर दिया गया।
इनमें चमोली, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, पोखरी पुल कर्णप्रयाग, घोलतीर रुद्रप्रयाग, कोटेश्वर टिहरी, गौचर, केदार उत्तरकाशी, हीना उत्तरकाशी, डुंडा उत्तरकाशी और उमरकोट कर्णप्रयाग शामिल हैं।
इसके बावजूद अधिकांश स्थानों पर लोग आज भी नदी के तल में ही अंतिम संस्कार कर रहे हैं। ऑडिट में पाया गया कि केवल केदार श्मशान घाट में ही कुछ चिताएं जलाई गईं।
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में भी नियमों की अनदेखी
रिपोर्ट में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर भी बड़ी लापरवाही सामने आई है।
प्रदेश के 44 नगर निकाय ऐसे पाए गए, जो प्रतिदिन पांच टन से अधिक ठोस कचरा एकत्र करते हैं। इसके बावजूद इनमें से किसी भी नगर निकाय ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PCB) से आवश्यक प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं किया है।
कुछ निकायों ने आवेदन जरूर किया, लेकिन वे पीसीबी के मानकों पर खरे नहीं उतर पाए।
योजना के क्रियान्वयन पर उठे सवाल
ऑडिट रिपोर्ट से स्पष्ट है कि गंगा की स्वच्छता के लिए बनाई गई कई परियोजनाएं योजनाबद्ध तरीके से लागू नहीं हो पाईं। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद एसटीपी का पूरा उपयोग नहीं हो रहा और कई परियोजनाएं केवल कागजों तक सीमित नजर आ रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते सीवर नेटवर्क को एसटीपी से नहीं जोड़ा गया और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को सख्ती से लागू नहीं किया गया, तो गंगा की स्वच्छता का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है।



