Chamoli News: ग्रीन और मसाला टी के बाद बाजार में उतरी कंडाली टी, खून की कमी दूर करने समेत कई औषधीय गुणों से भरपूर

चमोली।
ग्रीन टी और मसाला टी की लोकप्रियता के बाद अब हिमालयी क्षेत्र की जंगली घास कंडाली (नेटल) से बनी चाय भी बाजार में दस्तक दे चुकी है। कंडाली टी न सिर्फ सेहत के लिए फायदेमंद मानी जा रही है, बल्कि यह ग्रामीणों और महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए आय का नया जरिया भी बन रही है। चमोली जिले के कर्णप्रयाग क्षेत्र अंतर्गत कालेश्वर में हार्क (HARC) द्वारा अलकनंदा कृषि व्यवसाय स्वायत्त सहकारिता महिला समूह के माध्यम से कंडाली की चाय तैयार की जा रही है।

महिला समूहों द्वारा तैयार की जा रही कंडाली टी के लिए कंडाली की सूखी पत्तियां 100 से 150 रुपये प्रति किलो के भाव से खरीदी जा रही हैं। एक किलो कंडाली की पत्तियों से करीब 40 ग्राम के 25 से अधिक चाय पैकेट तैयार किए जा रहे हैं। इससे जहां महिला स्वयं सहायता समूहों को नियमित आय मिल रही है, वहीं गांवों से कंडाली की पत्तियां एकत्र कर लाने वाले ग्रामीणों को भी रोजगार उपलब्ध हो रहा है।

हार्क प्रबंधन के अनुसार बीते एक वर्ष में कंडाली पत्तियों की खरीद के एवज में ग्रामीणों को करीब डेढ़ लाख रुपये का भुगतान किया जा चुका है। कंडाली पहाड़ी इलाकों में सालभर पाई जाने वाली जंगली घास है, जिसे पहले केवल सब्जी के रूप में उपयोग किया जाता था, लेकिन अब इसके औषधीय गुणों के चलते चाय के रूप में भी पहचान मिल रही है।

बहुत गुणकारी है कंडाली

कंडाली (नेटल) का वैज्ञानिक नाम अर्टिका डायोइका (Urtica dioica) है। आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा में कंडाली को बेहद उपयोगी माना गया है। इसके सेवन से पेट संबंधी समस्याओं में राहत मिलती है। साथ ही यह खून की कमी दूर करने, हड्डियों को मजबूत बनाने और जोड़ों के दर्द में लाभकारी मानी जाती है। यही वजह है कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के बीच कंडाली टी की मांग तेजी से बढ़ रही है।

कंडाली की चाय की ऑनलाइन बिक्री भी शुरू हो चुकी है। इसके अलावा देहरादून और दिल्ली के बाजारों से भी इसे अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है। हार्क कालेश्वर, कर्णप्रयाग के प्रबंधक गणेश उनियाल के अनुसार, कंडाली पहाड़ में रोजगार का बेहतर साधन बनकर उभर रही है और आने वाले समय में इसके उत्पादन और बिक्री को और बढ़ाने की योजना है।

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