सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों को लेकर कड़ा और महत्वपूर्ण संदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पति-पत्नी अपने आपसी झगड़ों के लिए अदालतों को युद्धक्षेत्र न बनाएं। आरोप-प्रत्यारोप से न केवल विवाद और गहराता है, बल्कि इससे न्याय व्यवस्था पर भी अनावश्यक बोझ पड़ता है। ऐसे मामलों में सबसे पहले मध्यस्थता (मेडिएशन) का सहारा लिया जाना चाहिए, ताकि विवाद का मानवीय और स्थायी समाधान निकल सके।
यह टिप्पणी जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने एक वैवाहिक विवाद की सुनवाई के दौरान की। मामला ऐसे दंपति से जुड़ा था, जो शादी के बाद केवल 65 दिन साथ रहे और पिछले 10 वर्षों से अधिक समय से अलग-अलग रह रहे थे। कोर्ट ने इसे विवाह का पूरी तरह टूट जाना मानते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विवाह को समाप्त कर दिया।
अदालत जाने से पहले मध्यस्थता पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर पति-पत्नी के बीच आपसी तालमेल नहीं है, तो विवाद सुलझाने के कई रास्ते उपलब्ध हैं। अदालत जाने से पहले और मुकदमा शुरू होने के बाद भी मध्यस्थता अपनाई जा सकती है। कोर्ट ने खास तौर पर कहा कि जब वैवाहिक विवादों में आपराधिक मुकदमे दर्ज हो जाते हैं, तब सुलह की संभावनाएं काफी कम हो जाती हैं, इसलिए प्रारंभिक स्तर पर ही बातचीत और समझौते की कोशिश जरूरी है।
झूठे आरोप और एआई के दुरुपयोग पर चिंता
पीठ ने चिंता जताई कि मौजूदा समय में वैवाहिक विवादों में एक-दूसरे को सबक सिखाने की मानसिकता बढ़ती जा रही है। सबूत इकट्ठा करने की होड़ में कई बार झूठे या बनावटी आरोप भी लगाए जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के दौर में फर्जी सबूत तैयार करना और भी आसान हो गया है, जिसका समाज पर गंभीर और नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
मध्यस्थता केंद्रों की अहम भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि देश के लगभग हर जिले में मध्यस्थता केंद्र मौजूद हैं, जहां मुकदमा दर्ज होने से पहले भी सुलह कराई जा सकती है। कई मामलों में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं और विवाद सुलझने के बाद कुछ दंपति फिर से साथ रहने लगे हैं। कोर्ट ने ऐसे केंद्रों की भूमिका को और मजबूत करने की जरूरत पर भी जोर दिया।
बच्चों के कारण जटिल हो जाते हैं विवाद
कोर्ट ने माना कि जब पति-पत्नी के बीच बच्चों से जुड़े मुद्दे आ जाते हैं, तो विवाद और अधिक जटिल हो जाता है। कई बार बच्चे ही झगड़े का केंद्र बन जाते हैं। ऐसे मामलों में पक्षकारों, उनके वकीलों और परिवारजनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे काउंसलिंग और मध्यस्थता के विकल्प को प्राथमिकता दें।
पुलिस और निचली अदालतों को भी सलाह
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घरेलू विवाद से जुड़े मामूली मामलों में भी अगर शिकायत दर्ज होती है, तो सबसे पहले मध्यस्थता की कोशिश की जानी चाहिए। कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि पुलिस के पास शिकायत पहुंचने पर भी तुरंत आरोप-प्रत्यारोप की प्रक्रिया शुरू करने के बजाय सुलह का प्रयास किया जाए।
बढ़ते वैवाहिक मुकदमों पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता
शीर्ष अदालत ने कहा कि बदलते सामाजिक हालात में वैवाहिक मुकदमों की संख्या तेजी से बढ़ी है। ऐसे में सभी पक्षों की यह जिम्मेदारी है कि कानूनी लड़ाई शुरू करने से पहले विवाद सुलझाने की ईमानदार कोशिश करें। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अदालतों पर बढ़ते बोझ को कम करने और पारिवारिक विवादों को अधिक मानवीय तरीके से सुलझाने की दिशा में एक अहम और दूरगामी संदेश माना जा रहा है।



