उत्तराखण्ड ट्रांसफ़र एक्ट : आखिर किसके स्वार्थ के कारण सरकार लागू नहीं कर पा रही ?

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– इन्द्रेश मैखुरी

वर्ष 2002 में कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल के तत्कालीन कुलपति प्रो.बी.एस.राजपूत पर एक जर्मन नोबल पुरूस्कार विजेता वैज्ञानिक रैनेटा कैलौस के शोध पत्र की चोरी का आरोप लगा। कुलपति के शोध पत्र चोरी के खिलाफ छात्र संगठनों, कर्मचारी संगठनों तथा अन्य जागरूक लोगों ने कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल के घेराव का आह्वान किया।

निर्धारित तिथि पर हम विश्वविद्यालय घेराव करने पहुंचे तो पुलिस ने हमें तल्लीताल डाट में रोक दिया। पुलिस के साथ इस बात पर काफी बहस हुई कि हमें विश्वविद्यालय क्यूँ नहीं जाने देंगे? जब बहुत बहस गये तो इस बात पर सी.ओ. ने कहा, “तुम समझते नहीं हो यार, वहां राजपूत के आदमी तमंचा ले कर खड़े हैं, कोई तुम पर फायर झोंक देगा तो? मैंने उनसे कहा कि तब तो गिरफ्तार उन्हें किया जाना चाहिए, जो तमंचा ले कर खड़े हैं। पर पुलिस ने हमें ही गिरफ्तार किया और तमंचों से हमारी रक्षा के नाम पर बाद में लाठियां भी जम कर चलाई।

तब कुछ लोगों ने बताया था कि राजपूत के शार्प शूटरों का नेता विश्वविद्यालय में नियम-कायदों को धता बताते हुए नियुक्त हुआ एक प्रवक्ता था। इन हजरत की एक ख्याति यह भी थी कि ये क्लास पढ़ाने कभी नहीं जाते थे और इन्होने ठेके पर चार हजार रुपये में अपनी जगह क्लास लेने के लिए ठेके पर एक व्यक्ति रखा हुआ था।

कालान्तर में ये जुगाड़ भिड़ा कर कैंपस कॉलेज से गवर्नमेंट कॉलेज में किसी प्रशासनिक पद पर आ गए। इस तरह ये पढ़ाने के झंझट से मुक्त हुए और ठेके पर जो पढ़ाने के लिए व्यक्ति रखा हुआ था, उसके पैसे भी बचे! नेता ये भाजपा के थे, लेकिन इनको कैंपस कॉलेज से गवर्नमेंट कॉलेज में लाने की मेहरबानी कांग्रेस के राज में हुई!

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ऐसी एक नहीं अनेकों मिसालें हैं जहाँ पहुँच-पहचान वाले के लिए नियम-कायदों की किसी को याद तक नहीं आती और जिसका कोई पूछने वाला नहीं,वह कानून और एक्ट के बावजूद दर-दर भटकता रहता है।

एक सज्जन हैं, जिनका नाम मृत्युंजय कुमार मिश्रा है। मिश्रा साहब की मूल नियुक्ति देहरादून के एक राजकीय महाविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रवक्ता (जिसे अब असिस्टेंट प्रोफेसर कहा जाता है) के पद पर है।

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लेकिन मिश्रा साहब बीते कुछ वर्षों से पढ़ाने के अतिरिक्त सब कुछ कर रहे हैं। सत्ता कांग्रेस की हो या भाजपा की, मिश्रा जी को उनके पसंद की मलाईदार कुर्सी पर बैठाने के लिए सब पूरे मनोयोग से लगे रहते हैं। कई बार जांच के आदेश भी हुए पर सब गधे के सिर का सींग हो गए।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की पत्नी श्रीमति सुनीता रावत का किस्सा तो राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन चुका है कि वे पिछले 22 वर्षों से निरंतर देहरादून के एक प्राथमिक विद्यालय में जमी हुई हैं। पर त्रिवेंद्र रावत अकेले नहीं हैं, जिनकी पत्नी सत्ता संरक्षण में देहरादून में हैं। वित्त मंत्री प्रकाश पन्त की पत्नी के बारे में भी बताया गया है कि वे नियुक्त तो पिथौरागढ़ में हैं पर अटैचमेंट उनका देहरादून में हैं। दरअसल सत्ताधीशों का देहरादून से जो यह “अटैचमेंट” यानि लगाव है, वो ही किसी नीति, नियम, अधिनियम के लागू होने में सबसे बड़ी बाधा है।

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केंद्रीय मंत्री अजय टम्टा की पत्नी के बारे में तो चर्चा है कि वे बीते तीन वर्षों से स्कूल ही नहीं गयी।

इस श्रृंखला में एक नाम भाजपा के राज्य सभा सांसद अनिल बलूनी का भी है। बलूनी साहब की पत्नी एम.बी.पी.जी कॉलेज हल्द्वानी में रसायन विज्ञान की एसोसिएट प्रोफेसर हैं। बीते साल में बलूनी साहब जब राज्य सभा के सदस्य नहीं हुए थे और भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता थे, तभी उनकी पत्नी दिल्ली में उत्तराखंड की स्थानिक आयुक्त के पद पर भेज दी गयी।

एक तरफ प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री अरविन्द पाण्डेय प्रतिनियुक्ति खत्म करने की घोषणाएं करते रहे और दूसरी ओर रसूखदार शिक्षकों को पहाड़ से नीचे उतारने के लिए इस या उस नाम से प्रतिनियुक्ति का खेल भी होता रहा।

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बीते वर्ष में शिक्षा मंत्री ने ही शिक्षा निदेशालय में एक शिकायत निवारण प्रकोष्ठ बनने के नाम पर 5 शिक्षकों का अटैचमेंट निदेशालय में कर दिया। बाद में यह भी चर्चा चली कि ये शिक्षक, विभागीय मंत्री के सोशल मीडिया अकाउंट चलाने का काम करते हैं। अटैच किये गये उक्त शिक्षकों में से एक भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष ज्योति प्रसाद गैरोला की पत्नी हैं, जिन्हें टिहरी से देहरादून ले आया गया।

शिक्षा विभाग में गाहे-बगाहे कैबिनेट हरक सिंह रावत की हनक की चर्चा भी सुर्खियाँ बटोरती है। हरक सिंह रावत पिछली कांग्रेस की सरकार में भी मंत्री थे और भाजपा की वर्तमान सरकार में भी मंत्री हैं। शिक्षा विभाग की एक अफसर दमयंती रावत को अपने अधीनस्थ विभागों में प्रतिनियुक्ति पर लाने के लिए वे कांग्रेस सरकार के शिक्षा मंत्री से भी भिड़े रहे और वर्तमान सरकार के शिक्षा मंत्री से भी। यह भी रोचक है कि दोनों सरकार के शिक्षा मंत्रियों के साथ भिडंत में हरक सिंह रावत की हनक ही भारी पड़ती रही है।

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उनके एक चहेते शिक्षक विनोद रावत भी शिक्षा मंत्री के निर्देशों के बावजूद शिक्षा विभाग में एन.ओ.सी. लेकर प्रतिनियुक्ति पर जाने में कामयाब रहे। मॉडल अनुकृति गुसाईं, हरक सिंह रावत के बेटे के साथ विवाह बंधन में बंध चुकी हैं। इस साल के शुरुआत में जैसे ही यह रिश्ता तय हुआ, वैसे ही शिक्षा विभाग में कार्यरत अनुकृति की माता जी के लैंसडाउन से देहरादून तबादले की फाइल भी हरक सिंह रावत की अनुशंसा से सरपट दौड़ने लगी।

एक तरफ पहुँच-पहचान वालों के तबादले और प्रतिनियुक्ति की फाइलें सरपट दौड़ती रही और दूसरी तरफ कैंसर जैसे जघन्य रोगों से पीड़ित शिक्षकों की पीड़ा और जिन्दगी, अखबार के पन्नों पर ही दम तोड़ती रही। शिक्षा विभाग ऐसे मामलों से कैसे निपटता है, इसका अनुभव इस लेखक का भी है।

हमारे एक वरिष्ठ साथी की बिटिया का कैंसर का इलाज एम्स, नयी दिल्ली में चला। उनकी पत्नी नैनीताल जिले के दूरस्थ विद्यालय में शिक्षिका हैं। उनके तबादले की विधिवत अर्जी, जिसमें एम्स के प्रमाणपत्र संलग्न थे, लेकर मैं देहरादून के शिक्षा निदेशालय गया। कोई अतिरिक्त पक्षधरता यानि फेवर की मांग नहीं थी। केवल इतना निवेदन था कि एम्स के प्रमाणपत्र को मेडिकल बोर्ड स्वीकार कर ले।

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शिक्षा विभाग के उच्च पदस्थ अधिकारी बेहद गर्मजोशी से मिले। बोले-केस आपका एकदम जेनुइन है। यह तो होना ही है। बस इतना कर दीजिये कि किसी मंत्री से इस पर दो लाइन लिखवा दीजिये। मतलब साफ़ है कि केस कितना भी सही क्यूँ न हो, बिना सिफारिश के कागज आगे नहीं बढेगा और न ही कोई सुनवाई होगी।

एक शिक्षिका उत्तरा पन्त बहुगुणा के मामले में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत का रवैया पूरे देश में चर्चा का विषय बना है। लेकिन सवाल एक उत्तरा का नहीं है। सवाल उस नीतिगत अराजकता या नीति हीनता जैसी अवस्था का है, जिसे अपने चहेतों को फायदा पहुंचाने के लिए उत्तराखंड में कायम किया गया है। अगर नीयत में खोट नहीं है तो विधानसभा से तबादला कानून पास करवाने के बावजूद उसे क्रियान्वित क्यूँ नहीं किया जा रहा है ? आखिर वो किसका स्वार्थ है, जो उत्तराखंड सरकार को ट्रान्सफर एक्ट पर एक्ट करने से रोक रहा है ?
-इन्द्रेश मैखुरी