गढ़वाल रायफल के वीर गबर सिंह नेगी, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने किया विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित

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 अवनीश अग्निहोत्री(कोटद्वार)

छोटे से उत्तराखण्ड में कई ऐसे लोगो का जन्म हुआ है जिनके अंदर देश के लिए मर-मिटने का जुनून रहा है। देश के लिए कुछ कर गुजरने वाले महान सैनिकों की बात आती है तो उसमें उत्तराखण्ड के जवानों का जिक्र जरूर आता है। उन्ही में से कुछ वीर ऐसे भी जिन्होंने न सिर्फ उत्तराखण्ड और देश बल्कि विदेश में भी सम्मान पाकर इतिहास बनाया है। ऐसे ही एक ऐतिहासिक पुरुष है प्रथम विश्व युद्ध के वीर सैनिक गब्बर सिंह नेगी।
जिनकी बहादुरी का अंग्रेजी हुकुमत ने भी सम्मान किया है। यहा तक कि अंग्रेजों ने गब्बर सिंह के शहीद होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सबसे बड़े विक्टोरिया क्रॉस सम्मान से भी नवाजा। गब्बर सिंह नेगी का जन्म 21 अप्रैल 1895 को उत्तराखंड में टिहरी जिले के चंबा के पास मज्यूड़ गांव में एक गरीब परिवार में हुआ था। गबर सिंह अक्तूबर 1913 में गढ़वाल रायफल में भर्ती हो गए थे जिसके कुछ ही समय बाद ही गढ़वाल रायफल के सैनिकों को प्रथम विश्व युद्ध के लिए फ्रांस भेजा गया, जहां 1915 में न्यू शैपल में लड़ते-लड़ते 20 साल की उम्र में ही वो शहीद हो गए।

मृत्यु के बाद गब्बर सिंह को ब्रिटिश सरकार के सबसे बड़े सम्मान विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित गया। सबसे कम उम्र में विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित होने वाले शहीद गब्बर सिंह नेगी ही थे। तब से हर साल 21 अप्रैल को चंबा में उनके स्मारक स्थल पर गढ़वाल राइफल द्वारा रेटलिंग परेड कर उन्हें सलामी दी जाती है। साथ ही गढ़वाल के प्रवेश द्वार कोटद्वार का कौड़िया बेस कैम्प भी विक्टोरिया क्रास गबर सिंह नेगी के नाम से ही बनाया गया है। गढ़वाल राइफल का नाम विश्वभर में रोशन करने वाले वीर गब्बर सिंह नेगी की शहादत को याद करने के लिए हर साल चंबा में मेले का आयोजन होता है। लेकिन दुख कि बात है कि उत्तराखण्ड एक अलग प्रदेश बनने के बाद भी सरकार ऐसे ऐतिहासिक पुरुषों को भूलती जा रही है। हालांकि समय-समय पर सरकारों ने उनके नाम पर कई घोषणाएं तो की पर ये योजना धरातल पर अब तक नहीं उतरी।
यहा तक कि सरकार द्वारा विक्टोरिया क्रॉस गबर सिंह मेले को पर्यटन मेला घोषित किया था। इसका शासनादेश भी जारी हो गया था, लेकिन मेले के आयोजन के लिए सरकार की ओर से कोई भी सहायता नहीं दी जा रही है।
इतना ही नही सरकार वीसी गबर सिंह के पैतृक घर के संरक्षण पर भी कोई ध्यान नहीं दे रही है, जिस कारण उनके पैतृक घर की हालत खंडहर जैसी हो चुकी है। यही नहीं गब्बर सिंह नेगी के नाम पर चंबा में सेना की भर्ती होती थी, लेकिन 2005 से सेना की भर्ती भी नहीं हो रही है।