दिल्ली-एनसीआर में बार-बार भूकंप आने के ये हैं कारण, बता रहे हैं IIT के वैज्ञानिक

337

दिल्ली में बीते डेढ़ महीने में दस से अधिक बार भूकंप आ चुके हैं। लगातार भूकंप आने को एक्सपर्ट सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरीके से देख रहे हैं। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि बार-बार आ रहे भूकंपों को किसी बड़े भूकंप की आहट मानना पूरी तरह सही नहीं है। दूसरी तरफ यह भी संभव है कि छोटी तीव्रता के ये भूकंप किसी बड़े भूकंप की संभावना को कम कर रहे हों।

आईआईटी जम्मू के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर चंदन घोष का कहना है कि दिल्ली उत्तरी क्षेत्र में आती है। भूकंप के लिहाज से यह जोन-4 में है, इसलिए यह संवेदनशील है। पर्यावरण में बदलाव के चलते भूकंप के केंद्रों में भी बदलाव आ रहा है। यह प्लेटों के बदलाव के चलते हो रहा है। दिल्ली हिमालय के निकट है, जो भारत और यूरेशिया जैसी टेक्टॉनिक प्लेटों के मिलने से बना था। धरती के भीतर की इन प्लेटों में होने वाली हलचल की वजह से दिल्ली-एनसीआर, कानपुर और लखनऊ जैसे इलाकों में भूकंप का खतरा सबसे ज्यादा है।

यह भी पढ़े आस्‍ट्रेलिया के साथ हुए समझौतों से भारत को मिली नई ताकत, महाशक्ति बनने की खुलेगी राह

दिल्ली के पास सोहना, मथुरा और दिल्ली-मुरादाबाद तीन फॉल्ट लाइन मौजूद हैं, जिनके चलते बड़े भूकंप की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, कहा यह भी जा रहा है कि छोटे-छोटे भूकंपों से किसी बड़े भूकंप के आने की संभावना कम भी हो सकती है। दिल्ली रिज क्षेत्र कम खतरे वाला क्षेत्र है, वहीं मध्यम खतरे वाले क्षेत्र हैं- दक्षिण पश्चिम, उत्तर पश्चिम और पश्चिमी इलाका। सबसे ज्यादा खतरे वाले क्षेत्र हैं- उत्तर पूर्वी क्षेत्र। भूकंप के खतरे को मापने के लिए अब पैमानों में भी बदलाव आया है।

प्रोफेसर घोष का कहना है कि दिल्ली-एनसीआर में अभी इस बात का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है कि फॉल्ट लाइन मूवमेंट, ग्राउंड वाइब्रेशन, बिल्डिंग रिस्पांस को आपस में आधार बना किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाए।

आईआईटी रूड़की के प्रोफेसर एम एल शर्मा कहते हैं कि दिल्ली-एनसीआर में लगातार आ रहे भूकंप के बारे में कोई आकलन करना गलत होगा। दिल्ली-एनसीआर में मौजूद फॉल्ट की वजह से ये भूकंप आ रहे हैं। कभी-कभार यह फ्रीक्वेंसी बढ़ जाती है तो कभी कम हो जाती है। बेहतर यह है कि हमें भूकंप बचाव रोधी उपाय अपनाने चाहिए। पुरानी इमारतों, जगहों की रेट्रोफिटिंग की जानी चाहिए।

आईआईटी कानपुर के नेशनल इंफॉर्मेशन सेंटर ऑफ अर्थक्वेक इंजीनियरिंग के संयोजक प्रोफेसर दुर्गेश सी राय का कहना है कि दिल्ली-एनसीआर में जिस तरह के लोकल फॉल्ट सेस बार-बार भूकंप आ रहे हैं उससे किसी बड़े भूकंप की उम्मीद कम है। उन्होंने कहा कि हिमालय बेल्ट में तीव्रता से आने वाले भूकंप दिल्ली-एनसीआर को प्रभावित कर सकते हैं। अगर वहां ऐसा लगातार घटता है तो यह खतरे की घंटी हो सकती है। ऐसे में सबसे प्रमुख यह है कि हम अपने घरों को भूकंप रोधी बनाए।

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आर बी. सिंह का कहना है कि 90 प्रतिशत भूकंप टेक्टोनिक प्लेट के मूवमेंट के कारण आते हैं। पहली बात दिल्ली में करोल बाग, पुरानी दिल्ली के इलाकों की इमारतों पर ध्यान देने की जरूरत है। इससे भविष्य की किसी घटना से बचा जा सकता है। दूसरा इन लगातार भूकंप को किसी बड़े भूकंप की आहट के तौर पर माना जा सकता है।

पर मौजूदा समय में ऐसी कोई एक तकनीक नहीं है जिसका आकलन कर यह कहा जा सकें कि भूकंप कब आएगा और यह भूकंप किसी बड़े भूकंप का अंदेशा है। कई वैज्ञानिक और सांस्कृतिक आधार (जैसे कि पक्षियों का व्यवहार) आदि भी स्पष्ट आधार नहीं है। हमें सिंथेटिक अर्पाचर राडार तकनीक को विकसित करना होगा। यह एक रिमोट सेंसिग तकनीक है जो कि आकलन कर सकने की क्षमता कर सकने वाली बन सकती है।

मोटे तौर पर अब खतरे के तीन पैमाने सुनिश्चित हैं। पहला भूकंप की तीव्रता, दूसरा समय अंतराल। क्योंकि अमूमन भूकंप 35 से 40 सेकेंड का आता है। अगर यही भूकंप दो मिनट का हो गया तो भयानक नुकसान हो सकता है। तीसरा, क्षेत्र या देश की आर्थिक सामाजिक स्थिति क्योंकि समृद्ध व्यक्ति या देश हमेशा अच्छी गुणवत्ता वाली इमारतों का निर्माण करते हैं।

बार-बार झटके आखिर आते ही क्यों हैं?

जिन इलाकों में भूकंप का खतरा अधिक होता है, वहां सैकड़ों सालों में धरती की निचली सतहों में तनाव बढ़ने लगता है। ऐसा टेक्टॉनिक प्लेटों के अपनी जगह से हिलने के कारण होता है लेकिन तनाव का असर अचानक ही नहीं, बल्कि धीरे धीरे होता है। पहले लंबे समय तक धरती शांत रहती है, फिर कुछ समय के लिए परतें हिलने लगती हैं और यही प्रक्रिया बार बार दोहराई जाती है.

नेपाल उस जगह स्थित है, जहां धरती की परतों की गतिविधि सबसे ज्यादा है। यहां हर साल इंडियन प्लेट करीब चार सेंटीमीटर तक यूरेशियन प्लेट के नीचे खिसक जाती है। किसी भी महाद्वीप की प्लेट के लिए यह एक बहुत ही तेज गति है। हिमालय की बढ़ती ऊंचाई का भी यही कारण है।

खतरे के ढेर पर खड़ी दिल्ली, बेढंगे तरीके से विकास

दिल्ली का विकास बहुत ही बेढंगे तरीके से हुआ है। यहां कालोनियों का निर्माण काफी सघन है। साथ ही अवैध निर्माण से राजधानी मौत के ढेर पर खड़ी है। राजधानी की दो-तिहाई आबादी अवैध रूप से निर्मित मकानों में रह रही है। कुछ सालों पहले बिना भूकंप के ही लक्ष्मी नगर में गिरी इमारत भवनों की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है। दिल्ली में यमुना किनारे स्थित इलाके सर्वाधिक खतरे के दायरे में आते हैं।

पुरानों को भूकंप रोधी बनाना

चंदन घोष कहते हैं कि कई साल पहले भूकंप रोधी निर्माण तकनीकें उपलब्ध नहीं थीं। तब जो भवन, पुल आदि बने थे, उनमें इन तकनीकों का इस्तेमाल नहीं हो पाया था, लेकिन अब जब यह खतरा बढ़ रहा है और हमारे पास ऐसी तकनीकें हैं कि उन्हें भूकंपरोधी बनाया जाए तो इस दिशा में पहल होनी चाहिए। भू्कंप के हिसाब से संवेदनशील क्षेत्रों में इन तकनीकों को लोग अपना भी रहे हैं।

कैसे बनाएं भूकंपरोधी मकान

रेट्रोफिटिंग को भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा मान्यता प्राप्त है तथा कोई भी सिविल इंजीनियर यह तकनीक किसी भवन में लगा सकता है। इसके तहत पुराने भवन जो पिलर पर नहीं बने हैं, उनमें दरवाजों और खिड़कियों के ऊपर वाले हिस्सों में जहां से छत शुरू होती है, लिंटर बैंड डाले जाते हैं। इसके तहत भवन की चारों दीवारों के कोनों को लिंटर बैंड के जरिए आपस में जोड़ दिया जाता है। फर्क यह है कि लिंटर बैंड में लोहे की छड़ें इस्तेमाल होती हैं, जो कहीं ज्यादा मजबूत होती हैं। आईआईटी-दिल्ली के प्रोफेसर वसंत मतसागर का कहना है रेट्रोफिटिंग एक बेहतर तरीका है। पर जरूरत है कि पुरानी इमारतों की रेट्रोफिटिंग भी की जाए। इसके लिए भुज में कई तरह के उपाय किए गए हैं।

कैसी इमारतें हैं सुरक्षित

अमूमन ऐसा माना जाता है कि पिलर पर बनी इमारतें पूरी तरह सुरक्षित होती हैं। अलबत्ता पिलर वाली इमारत में यदि उसकी बुनियाद में भी भूकंपरोधी स्ट्रक्चर डाल दिया जाए तो फिर वे 90-95 फीसदी तक भूकंपरोधी हो जाती हैं। न्यूजीलैंड में पुरानी इमारतों को भूकंपरोधी बनाने के लिए बेस आइसोलेशन तकनीक अपनाई जा रही है। इसमें भवन की बुनियाद के नीचे चारों तरफ मैटल का एक ऐसा स्ट्रक्चर खड़ा कर दिया जाता है, जो भूकंप के कंपन को निचले हिस्से तक ही सीमित रखता है।

आईआईटी जम्मू के प्रोफेसर चंदन घोष कहते हैं कि जब भूकंप आता है तो सबसे ज्यादा खतरा उन भवनों को होता है, जो पिलर पर खड़ी नहीं होती हैं। भूकंप के दौरान पिलर पर खड़ी इमारत एक साथ हिलती है, जबकि बिना पिलर की इमारत की चारों दीवारें अलग-अलग हिलती हैं। इसलिए भवन गिरने लगते हैं। रेट्रोफिटिंग बिना पिलर वाली इमारतों को काफी हद तक जोड़ देती है और दीवार अलग-अलग नहीं हिलती हैं।

क्या है माइक्रोजोनिंग

दिल्ली की माइक्रोजोनिंग की जा चुकी है तथा भूकंप के हिसाब से इसे नौ हिस्सों में विभाजित किया जा चुका है। इनमें घनी आबादी वाले यमुनापार समेत तीन जोन सर्वाधिक खतरनाक हैं। पांच जोन मध्यम खतरे वाले हैं, एक जोन ही सुरक्षित है।

भूकंपीय जोन

भूकंप के खतरे के हिसाब से देश को चार हिस्सों में बांटा गया है, जोन-2, जोन-3, जोन-4 तथा जोन पांच। इनमें सबसे कम खतरे वाला जोन 2 है तथा सबसे ज्यादा खतरे वाला जोन-5 है। नार्थ-ईस्ट के सभी राज्य, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्से जोन-5 में आते हैं। उत्तराखंड के कम ऊंचाई वाले हिस्सों से लेकर उत्तर प्रदेश के ज्यादातर हिस्से, दिल्ली जोन-4 में आते हैं। मध्य भारत अपेक्षाकृत कम खतरे वाले हिस्से जोन-3 में आता है, जबकि दक्षिण के ज्यादातर हिस्से सीमित खतरे वाले जोन-2 में आते हैं, लेकिन यह एक मोटा वर्गीकरण है।

दिल्ली में कुछ इलाके हैं, जो जोन-5 की तरह खतरे वाले हो सकते हैं। इस प्रकार दक्षिण राज्यों में कई स्थान ऐसे हो सकते हैं, जो जोन-4 या जोन-5 जैसे खतरे वाले हो सकते हैं। दूसरे जोन-5 में भी कुछ इलाके हो सकते हैं, जहां भूकंप का खतरा बहुत कम हो और वे जोन-2 की तरह कम खतरे वाले हों।

क्या है भूकंपीय माइक्रोजोनिंग

माइक्रोजोनिक यानी सूक्ष्म वर्गीकरण करना। इसमें सतह की जमीन की संरचना की जांच की जाती है। दरअसल, जब भूकंप आता है तो मकान का भविष्य काफी हद तक जमीन की संरचना पर भी निर्भर करता है। मसलन, यदि भवन किसी नमी वाली सतह पर बना है, यानी रिज क्षेत्र या किसी ऐसी मिट्टी पर बना है, जो लंबे समय तक पानी को सोखती है तो उसे खतरा ज्यादा है। वहां मिट्टी लूज हो जाती है।

दूसरी तरफ, जहां मिट्टी शुष्क या बालू वाली हो, या पत्थर की चट्टानें नीचे हों, तो उसके भूकंप के दौरान अलग-अलग प्रभाव होते हैं। माइक्रोजोनिंग में क्षेत्र में प्रति 200 से 500 मीटर की दूरी पर जमीन में ड्रिलिंग करके मिट्टी के नमूने एकत्र किए जाते हैं तथा उसकी वैज्ञानिक जांच के बाद तय किया जाता है कि वह स्थान कितना संवेदनशील है।

रिक्टर पैमाना

रिक्टर स्केल भूकंप की तीव्रता मापने का एक गणितीय पैमाना है। इसे रिक्टर मैग्नीट्यूड टेस्ट स्केल कहा जाता है। यह एक लघुगुणक आधारित स्केल होता है, जो भूकंप की तरंगों की तीव्रता को मापता है। भूकंप की तरंगों को रिक्टर स्केल एक से नौ तक के अपने मापक पैमाने के आधार पर मापता है, लेकिन नौ कोई अंतिम बिंदु नहीं है, यह ऊपर भी जा सकता है। वैसे, आज तक इससे ऊपर का भूकंप नहीं आया है। रिक्टर पैमाने को सन 1935 में कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में कार्यरत वैज्ञानिक चार्ल्स रिक्टर ने बेनो गुटेनबर्ग के सहयोग से खोजा था।

मापन का आधार : इस स्केल के अंतर्गत प्रति स्केल भूकंप की तीव्रता 10 गुणा बढ़ जाती है और भूकंप के दौरान जो ऊर्जा निकलती है, वह प्रति स्केल 32 गुणा बढ़ जाती है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि 3 रिक्टर स्केल पर भूकंप की जो तीव्रता थी, वह 4 स्केल पर 3 रिक्टर स्केल का 10 गुणा बढ़ जाएगी।

दुनिया भर में साल में कई बार बजती है तबाही की घंटी

6.0 से 6.9 तक की तीव्रता वाला भूकंप साल में लगभग 120 बार दर्ज किया जाता है और यह 160 किलोमीटर तक के दायरे में काफी घातक साबित हो सकता है। 7.0 से लेकर 7.9 तक की तीव्रता का भूकंप एक बड़े क्षेत्र में भारी तबाही मचा सकता है और जो एक साल में लगभग 18 बार दर्ज किया जाता है।

रिक्टर स्केल पर 8.0 से लेकर 8.9 तक की तीव्रता वाला भूकंपीय झटका सैकड़ों किलोमीटर के क्षेत्र में भीषण तबाही मचा सकता है, जो साल में एकाध बार महसूस होता है। 9.0 से लेकर 9.9 तक के पैमाने का भूकंप हजारों किलोमीटर के क्षेत्र में तबाही मचा सकता है, जो 20 साल में लगभग एक बार आता है। दूसरी ओर 10.0 या इससे अधिक का भूकंप आज तक महसूस नहीं किया गया।

यह भी पढ़े :  किसानों को बेचा नकली कीटनाशक, गन्ना आयुक्त ने बैठाई जांच