मंत्रीजी जोश में बिसरा गए कि वह सूबे की भाजपा सरकार के कैबिनेट मिनिस्टर

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हरक सिंह रावत, सरकार के सबसे मुखर मंत्री। वाकपटु हैं, मगर कई दफा इसके कारण लेने के देने पड़ जाते हैं। मंत्रीजी को भी कुछ ऐसा ही तजुर्बा हुआ। दरअसल, मौका था हरेला का। हरेला, यानी हरियाली, इस पर्व को उत्तराखंड में खास तौर पर पौधारोपण को प्रोत्साहन देने के लिए मनाया जाता है। मंत्रीजी कार्यक्रम में पहुंचे, पौधारोपण किया और फिर नंबर आया भाषण का। आदतन, सिस्टम को गरियाना शुरू किया।

जोश में बिसरा गए कि सूबे की भाजपा सरकार के कैबिनेट मिनिस्टर हैं। पहुंच गए केंद्र की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे परियोजना पर। बोले, जो करोड़ों-अरबों खर्च कर कई दशकों में नहीं हो पाया, तीन-चार महीने के लॉकडाउन ने फ्री में कर दिखाया। वैसे यह सच भी है कि गंगा जितनी निर्मल इन दिनों है, वैसे तीन दशकों में कभी नहीं रही। खैर, किसी ने इशारा किया तो मंत्रीजी ठनके, संभले और साफ किया कि उनका आशय क्या था।दारोगाजी, दारू तो आवश्यक वस्तु है

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कोरोना की तेज रफ्तार, सरकार ने दोबारा शनिवार व रविवार को लॉकडाउन का फैसला किया। राजधानी की व्यस्त सड़क पर पुलिस बगैर जरूरी काम बाहर निकलने वालों को नियम कायदे बता-सिखाने में मशरूफ। अचानक नुक्कड़ पर कुछ शोर हुआ, नजदीक गए तो एक स्कूटर को रोक पुलिस चालान काटती दिखाई दी। स्कूटर सवार हाथ जोड़े दुहाई दे रहा था, ‘दारोगाजी, एक जरूरी काम था, जो सड़क पर आना पड़ा।’ दारोगाजी ठिठके, फिर पूछा, ‘ऐसे क्या जरूरी काम कि दो दिन नहीं रुक सकते।’

अभी तक गिड़गिड़ाता बंदा अचानक कमर में खोसा कुछ निकालने लगा तो दारोगाजी हड़बड़ाए, लेकिन जो निकला, उसे देख चौंके। हाथ में था दारू का अद्धा, दारोगाजी का पारा तो चढ़ना ही था। लठ उठता, इससे पहले ही बंदा छाती चौड़ाकर बोल पड़ा, ‘जनाब सरकार ने दवा के साथ दारू को भी आवश्यक वस्तु में शामिल कर लिया है। इसीलिए तो लॉकडाउन में भी ठेका खुला है।’

लॉकडाउन में आइसोलेट हुए दर्जाधारी मंत्री

उत्तराखंड की कैबिनेट में मुख्यमंत्री समेत नौ मंत्री, लेकिन 58 के आसपास ऐसे भी, जिन्हें सरकार ने कैबिनेट या राज्यमंत्री के दर्जे से नवाजा है। इन्हें सरकार ने निगमों, आयोगों, परिषदों में अध्यक्ष या उपाध्यक्ष पदों पर विराजा है। प्रत्येक महानुभाव पर सरकार हर महीने सवा लाख से ज्यादा खर्चती है। अब ये मत पूछिए कि इनका काम क्या है।

जब नौकरशाही मंत्रियों तक को भाव नहीं देती, तो इन दर्जाधारियों की बिसात क्या। इन दिनों सवाल उठ रहा है, चार महीनों के लॉकडाउन में एकाध को छोड़कर बाकी दर्जाधारी कहां लापता हैं। शायद कोरोना से सहमे हुए घर पर आइसोलेशन में खैर मना रहे हैं। महकमे को इनकी जरूरत न पहले थी, न अब है। ये इसी में खुश हैं कि हर महीने खाते में सवा लाख जमा हो रहे हैं। खाने-पीने और गाड़ी का खर्चा निकल ही रहा है तो क्यों फालतू में फटे में टांग फंसाई जाए।

हलक में जान, उनके जगे अरमान

सूबे में सत्तारूढ़ भाजपा के संगठन के मुखिया का बयान, उस पर तुरंत मुख्यमंत्री की मुहर, सत्ता के गलियारों में हलचल तो होगी ही। ऐसा ही कुछ हुआ, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत ने कहा कि डेढ़ साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हीं विधायकों को फिर मौका मिलेगा, जिनकी परफार्मेंस बेहतर होगी। सीएम बोले, अगर परफार्म नहीं कर पाते तो विधानसभा में क्यों रहें।

लाजिमी तौर पर भाजपा विधायकों में खलबली मचनी ही है क्योंकि पार्टी विस चुनाव में सिटिंग विधायकों के टिकट काटने में कभी हिचकी नहीं। उधर, विपक्ष कांग्रेस की मानों बाछें खिल गईं, पार्टी नेताओं को लगने लगा कि ऐसे में कई भाजपा विधायक पाला बदल उनके खेमे में आ सकते हैं। हौसलों की उड़ान देखिए, कांग्रेस विधायक दल की नेता डॉ. इंदिरा हृदयेश ने तुरंत ही ऐसे विधायकों को न्योता दे डाला, जिनके तेवर गाहेबगाहे भाजपा नेतृत्व के लिए मुश्किल खड़े करते रहते हैं।

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