अल्‍मोड़ा में कत्यूर कालीन धरोहर को संवारेंगे राजस्थान के शिल्पकार

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भारतीय स्थापत्य कला की नागरशैली की प्राचीन धरोहरों के संरक्षण को कदम बढ़ा लिए गए हैं। ऐसे में अब महाभारतकाल के मुनिश्रेष्ठ शुकदेव की तपस्थली शकुनी गांव (बगवालीपोखर) स्थित प्राचीन शुकेश्वर महादेव मंदिर समूह को उसका पुराना स्वरूप मिल सकेगा। खास यह कि कत्यूरकालीन दुर्लभ वलभी व पीढ़ा शैली के तीन और नागर शैली में बने एक मंदिर का जीर्णोद्धार राजस्थान के कुशल खानदानी शिल्पकार करेंगे। प्रदेश में कत्यूर व चंदशासनकाल में बने ये पहले मंदिर समूह हैं, जिन्हें शिल्पी दोबारा मौलिक स्वरूप देंगे।

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बेकद्री की मार झेल रहे जिले की पौराणिक धरोहर के दिन बहुरने लगे हैं। दरअसल, द्वाराहाट के ऐतिहासिक बगवालीपोखर स्थित शुकेश्वर महादेव मंदिर की पिछली दीवार रखरखाव के अभाव बेडौल व एक तरफ झुकने लगी थी। दरारें उपेक्षा से लगातार चौड़ी होती जा रही थी। अब पुरातत्व इकाई की देखरेख में नौवीं सदी में बने तीन व 16वीं सदी में निर्मित वर्तमान मंदिर के प्राचीन पत्थरों को उतार दिया गया है। पुरातत्वविदें की निगरानी में प्राचीन मंदिर के क्षतिग्रस्त पत्थरों की भरपाई स्थानीय ग्रीन ग्रेनाइट पत्थर लगाकर ही की जाएगी। ताकि विरासत का मूल स्वरूप बरकरार रखा जा सके।

इसलिए बुलाए गए राजस्थानी शिल्पी

राजस्थान में भी उत्तराखंड की ही तरह सातवीं से 10वीं सदी के मध्य मंदिरों के निर्माण का स्वर्णकाल माना जाता है। 11वीं से 13वीं सदी के बीच राजस्थान में श्रेष्ठ मंदिर निर्माण की शैली का उदय हुआ। वहीं उत्तराखंड में कत्यूरकाल (8वीं से 14वीं सदी) के दरमियान स्थापत्य कला चरम पर रही। हालांकि राजस्थान में पंचायतन शैली को महत्व दिया गया है। वहीं उत्तराखंड के बगवालीपोखर में शुकेश्वर महादेव मंदिर भारतीय हिंदू स्थापत्य कला नागर, पीढ़ा व बलरी शैली में बना है। खजुराहो, सोमनाथ व राजस्थान के आबू पर्वत पर दिलवाड़ा मंदिर भी नागरशैली में ही बने हैं। मंदिर स्थापत्यकला व शिल्पशास्त्र का विरासत में मिला ज्ञान व बेहतर पकड़ के कारण पुरातत्व इकाई ने राजस्थानी शिल्पियों के नौ सदस्यीय कुशल दल को यहां का जिम्मा दिया है। यह प्रयास प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में शानदार पहल मानी जा रही है।

केदारनाथ की प्रतिकृति

कत्यूरी राजाओं ने वलभी व पीढ़ा शैली में शुकेश्वर महादेव मंदिर स्थापित किया। कालांतर में चंद राजाओं ने उच्च शिखरयुक्त नागर शैली में पंचरथ की विशाल आकृति वाला आमलक बनवाया। ताकि मुनिश्रेष्ठ शुकदेव के इतिहास को जीवंत रखा जा सके।

जीर्णोद्धार में करीब एक करोड़ खर्च का अनुमान 

चंद्र सिंह चौहान, क्षेत्रीय प्रभारी पुरातत्व इकाई एवं संस्कृति विभाग उत्तराखंड ने बताया कि शुकदेव की तपोस्थली में वलभी व नागर शैली में बने शुकेश्वर महादेव मंदिर समूह के जीर्णोद्धार में करीब एक करोड़ का खर्च आने का अनुमान है। मंदिर समूह को उसका मूल स्वरूप देने में छह माह का वक्त लग सकता है। मौलिकता से छेड़छाड़ न हो, इसके लिए उसी गुणवत्ता वाले खास किस्म के पत्थर तलाशे गए हैं, जो उसमें इस्तेमाल किए गए थे।

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